समाज का इतिहास

  • हमारी भारतीय संस्कृति में वैदिक संस्कृति का असर केवल पच्चीस फीसदी भर है , पचहत्तर फीसदी अवैदिक संस्कृतियों के तत्व ही हमारी संस्कृति से जुड़े है ! सामाजिक संस्कृति का इतिहास इतना उलझा है कि किसी भी वर्ण या जाति उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई मतभेद हैं , प्रसिद्ध इतिहासकार भी एक मत नहीं है । यही बात हमारी जाती के बारे में है लोगो के भिन्न -भिन्न मत है । किन्तु एक बात स्पष्ट है कि वैदिक , सांस्कृतिक एंव ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर हम उच्चवर्णी हैं । भारतीय इतिहास के लिखने में सबसे बड़ी बाधा रही है की राजा प्रथा काल के तो ताम्रपत्र या शिलालेख उपलब्ध होते हैं किन्तु सामाजिक इतिहास केवल किवदन्तियों , लोकगीतों , गाथाओं श्रुतियों और सामाजिक एवं धार्मिक परम्पराओ पर आधारित है जो मौखिक है ! जब कि पाश्चात्य इतिहासकार केवल लिखित वक्तव्यों को ही प्रमाण मानते हैं ।
  • प्राचीन जातियों के मूल में अधिकांशतः उनके आदि ऋषि – महर्षि ही हैं , जिनके नाम से विभिन्न जातियां , उपजातियां उत्पन हुई समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था को माना गया जो कर्म आधारित थी किन्तु कालान्तर में उसे जन्म आधारित रुप दे दिया गया और जातियों को उनके द्वारा किये जाने वाले व्यवसाय से ही जाने जाना लगा चाहे वणधार पर कुछ भी रहे हों । हमारे साथ भी यही हुआ है । हमारे द्वारा भी परिस्थितिजन्य कारणों से ‘ ताम्बूल ‘ व्यवसाय को । अपनाया गया ! इतिहास के अनुसार इस व्यवसाय में अन्य समाज के वर्ग भी रहे है । लेकिन व्यवसाय की समानता से हमे भी ताम्बूलि यानि तम्बोली अपभ्रंश के रूप में मान लिया गया जबकि हमारे उच्चवर्णी समाज ने अन्य वर्गो को कभी अंगी कार नहीं किया , रोटी – बेटी का सम्बन्ध भी कभी नहीं रखा गया । ।
  • वास्तविकता के धरातल पर देखा जाए तो हम मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित हैं । पहला – कुमरावत समाज जो सूर्यवंशी क्षत्रिय वंशज ( वर्ण से क्षत्रिय , वंश से सूर्यवंशी और कुल से कुकभराउत / कुम्भरावत / अपभंशकुमरावत – क्षत्रिय राजा कुम्भा के वंशज है ) दूसरा वर्ग जो ब्राह्मण वंशीय है
  • ( ऋषि भारद्वाज वंशीय गौड़ ) हैं । कुसंयोग कहिए अथवा दुर्भाग्य दोनों ही वर्ग अपने मूल स्वरुप यानि क्षत्रियता या ब्राह्मणत्व से लगभग विलग हो चुके है , दोनों ही सदियों से कृषक ओर विभिन्न व्यवसायी होते हुए खान – पान , रहन – सहन , आचार – विचार , रीती – रिवाज मान्यताओं ओर परम्पराओ के आधार पर एक सामान वैषणव / वैश्य संस्कृति पोषण करते रहे है और यही उनकी मूल पहचान का आधार भी है । इतिहास साक्षी है दोनों ही वर्गो केवंशजो ने वैष्णव धर्म के अारंभ काल में ही श्री वल्ल्भाचार्य जी के शिष्य होकर वैष्णव धर्म अपनाया इन्हीं के बहुत से अनुयायी कई दशकों से समाज में वैष्णवसांस्क्रतिक धरोहर को अपनी पूर्ण संजोए हुए हैं । | जवाहरलाल नेहरु विश्वद्यिालय के इतिहासकार प्रो .आस्था ओर विशवास के साथ संजोहे हुए है !
    हमारी भारतीय संस्कृति में वैदिक संस्कृति का असर केवल पच्चीस फीसदी भर है , पचहत्तर फीसदी अवैदिक संस्कृतियों के तत्व ही हमारी संस्कृति से जुड़े है ! सामाजिक संस्कृति का इतिहास इतना उलझा है कि किसी भी वर्ण या जाति उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई मतभेद हैं , प्रसिद्ध इतिहासकार भी एक मत नहीं है । यही बात हमारी जाती के बारे में है लोगो के भिन्न -भिन्न मत है । किन्तु एक बात स्पष्ट है कि वैदिक , सांस्कृतिक एंव ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर हम उच्चवर्णी हैं । भारतीय इतिहास के लिखने में सबसे बड़ी बाधा रही है की राजा प्रथा काल के तो ताम्रपत्र या शिलालेख उपलब्ध होते हैं किन्तु सामाजिक इतिहास केवल किवदन्तियों , लोकगीतों , गाथाओं श्रुतियों और सामाजिक एवं धार्मिक परम्पराओ पर आधारित है जो मौखिक है ! जब कि पाश्चात्य इतिहासकार केवल लिखित वक्तव्यों को ही प्रमाण मानते हैं ।
  • प्राचीन जातियों के मूल में अधिकांशतः उनके आदि ऋषि – महर्षि ही हैं , जिनके नाम से विभिन्न जातियां , उपजातियां उत्पन हुई समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था को माना गया जो कर्म आधारित थी किन्तु कालान्तर में उसे जन्म आधारित रुप दे दिया गया और जातियों को उनके द्वारा किये जाने वाले व्यवसाय से ही जाने जाना लगा चाहे वणधार पर कुछ भी रहे हों । हमारे साथ भी यही हुआ है । हमारे द्वारा भी परिस्थितिजन्य कारणों से ‘ ताम्बूल ‘ व्यवसाय को । अपनाया गया ! इतिहास के अनुसार इस व्यवसाय में अन्य समाज के वर्ग भी रहे है । लेकिन व्यवसाय की समानता से हमे भी ताम्बूलि यानि तम्बोली अपभ्रंश के रूप में मान लिया गया जबकि हमारे उच्चवर्णी समाज ने अन्य वर्गो को कभी अंगी कार नहीं किया , रोटी – बेटी का सम्बन्ध भी कभी नहीं रखा गया । ।
  • वास्तविकता के धरातल पर देखा जाए तो हम मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित हैं । पहला – कुमरावत समाज जो सूर्यवंशी क्षत्रिय वंशज ( वर्ण से क्षत्रिय , वंश से सूर्यवंशी और कुल से कुकभराउत / कुम्भरावत / अपभंशकुमरावत – क्षत्रिय राजा कुम्भा के वंशज है ) दूसरा वर्ग जो ब्राह्मण वंशीय है
  • ( ऋषि भारद्वाज वंशीय गौड़ ) हैं । कुसंयोग कहिए अथवा दुर्भाग्य दोनों ही वर्ग अपने मूल स्वरुप यानि क्षत्रियता या ब्राह्मणत्व से लगभग विलग हो चुके है , दोनों ही सदियों से कृषक ओर विभिन्न व्यवसायी होते हुए खान – पान , रहन – सहन , आचार – विचार , रीती – रिवाज मान्यताओं ओर परम्पराओ के आधार पर एक सामान वैषणव / वैश्य संस्कृति पोषण करते रहे है और यही उनकी मूल पहचान का आधार भी है । इतिहास साक्षी है दोनों ही वर्गो केवंशजो ने वैष्णव धर्म के अारंभ काल में ही श्री वल्ल्भाचार्य जी के शिष्य होकर वैष्णव धर्म अपनाया इन्हीं के बहुत से अनुयायी कई दशकों से समाज में वैष्णवसांस्क्रतिक धरोहर को अपनी पूर्ण संजोए हुए हैं । | जवाहरलाल नेहरु विश्वद्यिालय के इतिहासकार प्रो .आस्था ओर विशवास के साथ संजोहे हुए है !

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